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RBI MPC October 2026 Meeting: आरबीआई ने रेपो रेट समेत किए 5 बड़े ऐलान, जानें आपके लिए क्या-क्या बदला
RBI MPC October 2026 Meeting: RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की तीन दिवसीय बैठक के बाद RBI गवर्नर ने रेपो रेट में बड़ा बदलाव किया है. महंगाई, आर्थिक विकास, कच्चे तेल की कीमत, रुपये की चाल और वैश्विक बाजार जैसे कई मुद्दों पर चर्चा के बाद फैसला लिया गया है. रेपो रेट में बढ़ोतरी का असर होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरों और EMI पर पड़ेगा. इस लाइव ब्लॉग में आप RBI MPC मीटिंग के सभी अहम फैसलों के बारे में जान सकते हैं.
RBI MPC October 2026 Meeting:
RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की तीन दिन से चल रही बैठक आज, बुधवार 7 अक्टूबर को खत्म हो गई. RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए MPC के फैसलों और आगे की नीति को लेकर केंद्रीय बैंक का रुख बताएं. इस बार रेपो रेट में 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी का ऐलान किया गया.
रेपो रेट पर फैसला लेते समय RBI ने महंगाई, आर्थिक ग्रोथ, कच्चे तेल की कीमतों, रुपये की चाल और ग्लोबल मार्केट के हालात जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखा. अगर रेपो रेट बढ़ता है, तो होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन महंगे होने की उम्मीद बढ़ती है क्योंकि लोन की EMI बढ़ जाती है. इस लाइव ब्लॉग में हम आपको आरबीआई के सभी फैसलों के बारे में बताएंगे.
व्यावहारिक लाभों पर भी ध्यान
श्री श्रीनिवास चौधरी, फाउंडर एवं CEO, Alligator Automations- रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी से कंपनियां नई परियोजनाओं और खर्चों को लेकर अधिक सतर्क हो सकती हैं, खासकर उन योजनाओं में जहां शुरुआत में बड़ी पूंजी निवेश की जरूरत होती है. मैन्युफैक्चरर्स के लिए ऑटोमेशन अपनाने के पीछे कई कारण होते हैं. वे एक ओर इसके लिए होने वाली फाइनेंसिंग लागत को देखते हैं, वहीं दूसरी ओर उत्पादन में बढ़ोतरी, उत्पाद की गुणवत्ता में निरंतरता और रोजमर्रा के संचालन में आने वाली समस्याओं में कमी जैसे व्यावहारिक लाभों पर भी ध्यान देते हैं.
ब्याज दरों में बढ़ोतरी के माहौल में कंपनियां ऑटोमेशन प्रोजेक्ट्स के ROI को और अधिक बारीकी से परख सकती हैं. साथ ही, वे यह भी देखती हैं कि निवेश की लागत कितने समय में पूरी हो सकेगी. ऐसे में कंपनियां उन ऑटोमेशन समाधानों को प्राथमिकता दे सकती हैं जो किसी स्पष्ट परिचालन समस्या का समाधान करते हों और जिनके परिणामों को मापा जा सके, बजाय इसके कि केवल तकनीक अपनाने की होड़ में निवेश किया जाए. मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र के लिए लक्ष्य स्पष्ट रहेगा- खर्चों में अनुशासन बनाए रखते हुए ऐसी प्रोडक्शन लाइनों में निवेश जारी रखना, जो अधिक कुशल, मजबूत और प्रतिस्पर्धी हों.
कमर्शियल रियल एस्टेट में कैप रेट्स भी बढ़ सकते हैं
विजय राउंदल, मैनेजिंग डायरेक्टर, Teerth Realties- कमर्शियल रियल एस्टेट की बात करें तो रेपो रेट में बढ़ोतरी का असर ऑफिस स्पेस, वेयरहाउसिंग और रिटेल सेगमेंट पर अलग-अलग देखने को मिल सकता है. इन क्षेत्रों में डिमांड काफी हद तक बिजनेस साइकल और ऑफिस में कर्मचारियों की वापसी जैसे ट्रेंड्स से प्रभावित होगी. उधारी की लागत बढ़ने के साथ कमर्शियल रियल एस्टेट में कैप रेट्स भी बढ़ सकते हैं, जिसका असर REITs और इंस्टीट्यूशनल निवेशकों पर अधिक दिखाई दे सकता है. हालांकि, सुनिश्चित किराये वाले Grade A ऑफिस स्पेस की डिमांड बनी रह सकती है, वहीं कमजोर एसेट्स के लिए रीफाइनेंसिंग में और देरी हो सकती है.
रिटेल रियल एस्टेट में बढ़ी हुई EMI और सीमित डिस्क्रिशनरी स्पेंडिंग के कारण फुटफॉल पर दबाव आ सकता है. इसका असर निकट अवधि में कैपिटल एक्सपेंडिचर और नई सप्लाई पर भी देखने को मिल सकता है. कमर्शियल रियल एस्टेट को एक आकर्षक एसेट क्लास बनाए रखने के लिए मनी मार्केट रेट्स में स्थिरता बेहद महत्वपूर्ण होगी.
रिटेल रियल एस्टेट में बढ़ी हुई EMI और सीमित डिस्क्रिशनरी स्पेंडिंग के कारण फुटफॉल पर दबाव आ सकता है. इसका असर निकट अवधि में कैपिटल एक्सपेंडिचर और नई सप्लाई पर भी देखने को मिल सकता है. कमर्शियल रियल एस्टेट को एक आकर्षक एसेट क्लास बनाए रखने के लिए मनी मार्केट रेट्स में स्थिरता बेहद महत्वपूर्ण होगी.
EMI में होने वाले बदलाव
श्री शिव गर्ग, डायरेक्टर, Forteasia Realty Pvt. Ltd.- रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी के बाद इसके 5.50% तक पहुंचने का असर रेजिडेंशियल डिमांड पर पड़ सकता है. लोअर और मिड-सेगमेंट सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं, क्योंकि ये सेगमेंट EMI में होने वाले बदलावों के प्रति अधिक संवेदनशील हैं. फेस्टिव क्वार्टर के दौरान कन्वर्जन की रफ्तार धीमी हो सकती है, हालांकि लग्जरी हाउसिंग इसका अपवाद रह सकती है. बड़ी चिंता यह है कि लगातार दरों में बढ़ोतरी से यह संकेत गया है कि उधारी की लागत लंबे समय तक ऊंची रह सकती है. ऐसे में खरीदार नए प्रोजेक्ट्स की तुलना में रेडी-टू-मूव इन्वेंट्री को प्राथमिकता दे सकते हैं, क्योंकि वे अतिरिक्त वित्तीय देनदारी लेने से बचना चाहेंगे. जब तक डिमांड में तेज उछाल नहीं आता, नए प्रोजेक्ट लॉन्च में देरी हो सकती है. मांग में नरमी के बीच कीमतों में करेक्शन की संभावना बनी रहेगी और खरीदारों को मौजूदा बायर्स मार्केट में अधिक मोलभाव करने की स्थिति मिल सकती है.
अगस्त में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.82% हो गई
लक्ष्मी वेंकटरमन वेंकटेशन (बीवाईएसटी की संस्थापक और प्रबंधन ट्रस्टी) के अनुसार, “अगस्त में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.82% हो गई है और यह अभी भी आरबीआई के 4% के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है. वहीं, खाद्य महंगाई 5.95% रही है. खाद्य कीमतों पर लगातार दबाव और वैश्विक स्तर पर अनिश्चित बाहरी परिस्थितियों के बीच आरबीआई द्वारा रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी कर इसे 5.25% से 5.50% करना, बढ़ते व्यापक मूल्य दबाव को नियंत्रित करने और व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखने की आवश्यकता को दर्शाता है. केंद्रीय बैंक हाल में आए FCNR फंड के कारण बढ़ी हुई मनी सप्लाई को देखते हुए CRR (वर्तमान में 3%) और SLR (वर्तमान में 18%) में भी 25–50 बेसिस पॉइंट की वृद्धि पर विचार कर सकता है. सूक्ष्म और छोटे उद्यमियों के लिए, चूंकि बैंक की ब्याज दरें रेपो रेट से जुड़ी होती हैं, इसलिए इस बढ़ोतरी का उनके बैंक ऋणों, विशेष रूप से कार्यशील पूंजी (Working Capital) ऋण पर सीधा असर पड़ेगा. ऐसे समय में ब्याज दरों में बढ़ोतरी हो रही है, जब कई उद्यमी पहले से ही बढ़ती कच्चे माल, ऊर्जा और संचालन लागत का सामना कर रहे हैं. उधार की लागत में मामूली वृद्धि भी कार्यशील पूंजी, ऋण की किस्तों तथा कारोबार के विस्तार, नई नियुक्तियों और निवेश से जुड़े निर्णयों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है.
इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि मौद्रिक नीति में सख्ती के साथ-साथ अंतिम स्तर तक ऋण की बेहतर उपलब्धता, पर्याप्त कार्यशील पूंजी सहायता, खरीदारों द्वारा सूक्ष्म एवं छोटे उद्यमों को समय पर भुगतान और उचित पुनर्भुगतान संरचनाएं सुनिश्चित की जाएं, ताकि सक्षम और व्यवहार्य सूक्ष्म उद्यम महंगे अनौपचारिक वित्तीय स्रोतों की ओर जाने के लिए मजबूर न हों. पहली पीढ़ी के उद्यमियों, महिला उद्यमियों और ग्रांप्रेन्योर® के लिए किफायती औपचारिक ऋण, साथ में मार्गदर्शन और व्यवसाय संबंधी सलाह, मजबूत और टिकाऊ उद्यम खड़े करने, रोजगार बनाए रखने तथा यह सुनिश्चित करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे कि महंगाई से निपटने की प्रक्रिया जमीनी स्तर पर उद्यमिता के विकास की कीमत पर न हो.
मेरा सुझाव है कि ₹25 लाख तक के ऋण लेने वाले सूक्ष्म और नैनो उद्यमियों को ब्याज सब्सिडी (Interest Subvention) के माध्यम से सहायता दी जानी चाहिए, जिसमें उनके ब्याज भार में हुई वृद्धि की भरपाई के लिए समान अनुपात में ब्याज सहायता दी जाए, ताकि वे अपने कारोबार को जारी रख सकें और आर्थिक रूप से टिकाऊ बने रह सकें.”
घर खरीदना थोड़ा महंगा
अनिल फरांदे, फाउंडर, Pharande Spaces एवं प्रेसिडेंट, CREDAI के RBI द्वारा Repo Rate में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी कर इसे 5.50% करने से रियल एस्टेट मार्केट में थोड़ी सावधानी देखने को मिल सकती है. खासकर उन लोगों पर इसका असर पड़ सकता है जो ब्याज दरों में बदलाव को लेकर अधिक संवेदनशील हैं. Repo Rate बढ़ने से लोन की ब्याज दर और EMI पर थोड़ा असर पड़ सकता है, जिससे कुछ खरीदारों के लिए घर खरीदने का फैसला लेना मुश्किल हो सकता है. हालांकि, इसका असर रियल एस्टेट के सभी सेगमेंट पर एक जैसा नहीं होगा. रोजगार, लोगों की अपनी जरूरतें और बेहतर घर खरीदने की इच्छा जैसे कई कारण आज भी हाउसिंग डिमांड को मजबूत बनाए हुए हैं. जिन लोगों की आर्थिक स्थिति मजबूत है, वे ब्याज दर में मामूली बढ़ोतरी के बावजूद घर खरीदने का फैसला जारी रख सकते हैं. वहीं, डेवलपर्स भी कीमतों, पेमेंट प्लान और प्रोजेक्ट की पेशकश पर अधिक ध्यान देंगे. अब सबसे अहम बात यह होगी कि Repo Rate में हुई बढ़ोतरी का असर आम होम लोन ग्राहकों तक कितना पहुंचता है. अगर ब्याज दरों में बढ़ोतरी सीमित रहती है, तो हाउसिंग सेक्टर इस बदलाव को आसानी से संभाल सकता है.
RBI ने West Asia, ट्रेड और AI शेयरों के जोखिम पर जताई चिंता
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि West Asia में जारी संघर्ष, ट्रेड को लेकर अनिश्चितता और बढ़ती बॉन्ड यील्ड की वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता बनी हुई है. इसके अलावा, AI से जुड़ी कंपनियों के शेयरों की ऊंची वैल्यूएशन में अचानक बड़ी गिरावट का जोखिम भी है. उन्होंने कहा कि इन सभी जोखिमों का असर उभरती अर्थव्यवस्थाओं (Emerging Markets) के प्रति निवेशकों के भरोसे और बाजार के सेंटीमेंट पर पड़ सकता है.